Wednesday, May 13, 2009

"हम तो मैया के"..................................

बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चौका- बासन
चिमटा फुंकनी जैसी माँ.....


...बीबी बेटी बहन पड़ोसन
थोड़ी-थोड़ी सी सब में
दिनभर एक रस्सी के उपर
चलती नटनी जैसी माँ.
निदा फ़ाज़ीली


ऐसी होती है माँ
जब मैं शाम को घर भींगता हुआ घर आया तो
भैया ने पूछा-
तुमने छाता क्यों नहीं लिया?
दीदी ने सलाह दी-
वर्षा ख़त्म होने तक रुक क्यों नहीं गये?
पिता ने चेतावनी दी-
जब ठंड लग जाएगी तभी तुम्हें समझ आएगी
पर माँ ने मेरे गीले बालों को सुखाते हुए कहा -
उफ़ मेरे बच्चे के घर आने तक क्या बारिश रुक नहीं सकती थी?
(अंतरजाल से संकलित)


माँ की ममता और दुलार से भींगे एस अनन्य स्रोत का सम्मान करते हुए 'मदर्स डे' की शुरुआत प्राचीन काल में ग्रीक और रोमन काल में हुई थी. पर इस दिन को विधिवत मनाने की प्रथा अमेरिका ने शुरू की. इस दिन को यादगार बनाने का श्रेय जूलिया वार्ड हौवे और अन्ना जार्विस को जाता है.
1872 में जूलिया वार्ड हौवे एक सशक्त लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रभावी युद्धगान कवि के रूप में उभरी थीं. उन्होंने मदर्स डे मनाने की गुज़ारिश हर माँ से की.दूसरी ओर अन्ना जार्विस ने अपनी माँ अन्ना मेरी रीव्स जार्विस के विचारों से प्रेरित होकर ' मदर्स डे' मनाने की सिफारिश आम जनता से की.
1911 तक अमेरिका के अधिकांश राज्य इस दिन को मनाने लगे. 8 मई 1914 को प्रेसिडेंट वुद्राव विल्सन ने हर वर्ष मई के दूसरे रविवार को 'मदर्स दे ' मनाने की घोषणा की . आज इसे अमेरिका ही नहीं ब्रिटेन,इंडिया,डेनमार्क,फिनलैंड,इटली,टर्की,आस्ट्रेलिया,मेक्सिको,कनाडा,चीन,,जापान और बेल्जियम आदि में मनाया जाने लगा है.

कहते हैं कि जब भगवान को ऐसा लगा क़ि वह हर जगह उपस्थित नहीं रह सकता तो उसने माँ को गढ़ा. एक चीनी कहावत के अनुसार हर माँ की नज़र में उसका ही बच्चा सबसे सुंदर होता है.सच ही तो है. माँ और उसकी संतान के मध्य यह रिश्ता पवित्र और शर्तों की सीमाओं से परे है.यह हम और आप सबके दिल में बसा है. माँ की नज़र में हम हमेशा बच्चे ही रहते हैं.
नादानी में कभी -कभी हमें माँ का दुलार बंधन सा प्रतीत होने लगता है.जब तक हमें सत्य का अहसास होता है तब तक देर हो चुकी होती है. ऐसी अमूल्य शरणास्थली का महत्त्व नकारिये मत. इस अनोखे बंधन का सम्मान कीजिए.
स्कूल में शिवपूजन सहाय की रचना 'देहाती दुनिया' के कुछ अंश पढ़ाए गए थे. जिसमें लेखक ने अपने बचपन का रेखाचत्र आँकते हुए माँ की स्नेहमयी छवि इन शब्दों में उतारी थी ..........'हम तो मैया के आँचल में, करुणा के क्रोड़ में, ममता की मंजूषा में, वात्सल्य की वाटिका में, स्नेह के सुख सदन में सोए पड़े थे.'
एक क्षण को आँखें मूँद कर इन शब्दों को दुहराइए. पहुँच गये न माँ के आँचल में.

देर से ही सही पर आप सबको मदर्स डे की मुबारकबाद

5 comments:

upendra said...

belated happy mothers day to u too.
" mata na kumata ho sakati
ho putra kuputra bhale kathod
sab dev deviyan ek od
aye ma meri tu ek od"

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर अभिव्‍यक्ति .. सचमुच मां मां होती है .. कोई जगह नहीं ले सकता इसकी।

विनय said...

बहुत ही हृदयस्पर्शी लेखन है, माँ के लिए इससे बेहतर तोहफ़ा क्या होगा!

MUMBAI TIGER मुम्बई टाईगर said...

बहुत सही जी

मॉ तो आखिर मॉ होती है प्रणाम

बहुत सुन्दर

आभार

मुम्बई टाईगर

हे प्रभु यह तेरापन्थ

work for housewives said...

first time visiting to your blog ,intresting hindi padkar maza aa gya i belong to rajsthah