Wednesday, May 20, 2009

भुबनेस्वर की बोलती दीवारें

वर्षों पहले जब मैने इस राज्य में कदम रक्खा था,ओडीषा राज्य के बारे में बस इतनी ही जानकारी थी
कि
इसकी राजधानी कटक की जगह भुबनेस्वर हो गई है और हिंदुओं के चार पवित्र धामों में से एक पुरी इसी राज्य में स्थित है. हमारे पतिदेव उस वक़्त ढेंकनाल नामक जगह पर ट्रेनिंग कर रहे थे. उस वक़्त हम इसी उधेड़बुन में रहते थे, हो हो नाम सही लिखने में उनसे ज़रूर कोई ग़लती हो गई होगी. ,दूसरी जानकारी यह थी
कि
मुझे शादी के बाद जयपुर जाना होगा. हमारे सिलेबस में जयपुर एक ही था. जब एस.टी.डी. कोड मालूम करने के लिए टेलीफ़ोन डायरेक्टरी खोली तब आँखें खुलीं कि जयपुर और जैपुर दो जगहें हैं. जैपुर की कहानी फिर सही. भुबनेस्वर से आप सभी परिचित हैं. इस शहर को मंदिरों
के शहर के नाम से भी जाना जाता है.
हाल में ही इसशहर की दीवारें भी बोल उठी हैं. है हैरानी की बात! यह संभव हुआ भुबनेस्वर म्यूनिस्पल कार्पोरेशन के ज़बर्दस्त आइडिया और कलाकारों की मेहनत के कमाल से. जिसके कारण यहाँ की दीवारों पर आपको बेतरतीब पोस्टर और पान की पीक आदि की जगह सुरुचिपूर्ण बनाई गई कलात्मक अभिव्यक्तियाँ मिलेंगी. जो इस राज्य की संपन्न कला, रहन-सहन ,वेशभूषा आदि की जानकारी देती हैं.
सबसे पहले शुरुआत की गई 'सउरा पेंटिंग' से. एक नमूना देखिए















सउरा जाति भारत की प्राचीन जनजातियों में से एक है. ओडिषा की इस जनजाति द्वारा बनाई जाने वाली इस चित्रकला को सउरा पेंटिंग के नाम से जाना जाता है. यह चित्रकला इनके जीवन का झरोखा हैं. जिनमें उनकी विविध अभिव्यक्ति देखने को मिलती हैं. यह चित्रकारी महाराष्ट्र की वरली चित्रकारी से बहुत मिलती जुलती है. दूसरे शब्दों में यह चित्रकला सउरा जाति के विश्‍वास और दर्शन का आईना हैं.
इतना सब कुछ कह जाती हैं भुबनेस्वर की ये अपरिचित दीवारें.

Wednesday, May 13, 2009

"हम तो मैया के"..................................

बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चौका- बासन
चिमटा फुंकनी जैसी माँ.....


...बीबी बेटी बहन पड़ोसन
थोड़ी-थोड़ी सी सब में
दिनभर एक रस्सी के उपर
चलती नटनी जैसी माँ.
निदा फ़ाज़ीली


ऐसी होती है माँ
जब मैं शाम को घर भींगता हुआ घर आया तो
भैया ने पूछा-
तुमने छाता क्यों नहीं लिया?
दीदी ने सलाह दी-
वर्षा ख़त्म होने तक रुक क्यों नहीं गये?
पिता ने चेतावनी दी-
जब ठंड लग जाएगी तभी तुम्हें समझ आएगी
पर माँ ने मेरे गीले बालों को सुखाते हुए कहा -
उफ़ मेरे बच्चे के घर आने तक क्या बारिश रुक नहीं सकती थी?
(अंतरजाल से संकलित)


माँ की ममता और दुलार से भींगे एस अनन्य स्रोत का सम्मान करते हुए 'मदर्स डे' की शुरुआत प्राचीन काल में ग्रीक और रोमन काल में हुई थी. पर इस दिन को विधिवत मनाने की प्रथा अमेरिका ने शुरू की. इस दिन को यादगार बनाने का श्रेय जूलिया वार्ड हौवे और अन्ना जार्विस को जाता है.
1872 में जूलिया वार्ड हौवे एक सशक्त लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रभावी युद्धगान कवि के रूप में उभरी थीं. उन्होंने मदर्स डे मनाने की गुज़ारिश हर माँ से की.दूसरी ओर अन्ना जार्विस ने अपनी माँ अन्ना मेरी रीव्स जार्विस के विचारों से प्रेरित होकर ' मदर्स डे' मनाने की सिफारिश आम जनता से की.
1911 तक अमेरिका के अधिकांश राज्य इस दिन को मनाने लगे. 8 मई 1914 को प्रेसिडेंट वुद्राव विल्सन ने हर वर्ष मई के दूसरे रविवार को 'मदर्स दे ' मनाने की घोषणा की . आज इसे अमेरिका ही नहीं ब्रिटेन,इंडिया,डेनमार्क,फिनलैंड,इटली,टर्की,आस्ट्रेलिया,मेक्सिको,कनाडा,चीन,,जापान और बेल्जियम आदि में मनाया जाने लगा है.

कहते हैं कि जब भगवान को ऐसा लगा क़ि वह हर जगह उपस्थित नहीं रह सकता तो उसने माँ को गढ़ा. एक चीनी कहावत के अनुसार हर माँ की नज़र में उसका ही बच्चा सबसे सुंदर होता है.सच ही तो है. माँ और उसकी संतान के मध्य यह रिश्ता पवित्र और शर्तों की सीमाओं से परे है.यह हम और आप सबके दिल में बसा है. माँ की नज़र में हम हमेशा बच्चे ही रहते हैं.
नादानी में कभी -कभी हमें माँ का दुलार बंधन सा प्रतीत होने लगता है.जब तक हमें सत्य का अहसास होता है तब तक देर हो चुकी होती है. ऐसी अमूल्य शरणास्थली का महत्त्व नकारिये मत. इस अनोखे बंधन का सम्मान कीजिए.
स्कूल में शिवपूजन सहाय की रचना 'देहाती दुनिया' के कुछ अंश पढ़ाए गए थे. जिसमें लेखक ने अपने बचपन का रेखाचत्र आँकते हुए माँ की स्नेहमयी छवि इन शब्दों में उतारी थी ..........'हम तो मैया के आँचल में, करुणा के क्रोड़ में, ममता की मंजूषा में, वात्सल्य की वाटिका में, स्नेह के सुख सदन में सोए पड़े थे.'
एक क्षण को आँखें मूँद कर इन शब्दों को दुहराइए. पहुँच गये न माँ के आँचल में.

देर से ही सही पर आप सबको मदर्स डे की मुबारकबाद

Friday, May 8, 2009

दीपक डेब्रॉयल एक सशक्‍त अभिनेता


अपनी पिछली पोस्ट "शौर्य" में मैने परदे पर उभरते नवोदित कलाकार दीपक डेब्रॉयल की चर्चा की थी. आइए इस कलाकार के अभिनय के सफ़र के पन्ने पलटें.
दीपक पौड़ी गढ़वाल के बाशिंदे हैं. इन्होंने अपने अभिनय के कैरियर की शुरुआत 1994 में प्रमुख नाट्य निर्देशक अरविंद गौर के साथ की थी. श्री गौर के निर्देशन में दीपक जी के प्रमुख नाटक रहे तुगलक़, अंधा युग, रक्‍त कल्याण, कोर्ट मार्शल... आदि. छह वर्षो'अस्मिता ' से जुड़े रहने के बाद ,दीपक को एक वर्ष चर्चित निर्देशक पंडित एन.के.शर्मा की छत्रछाया में कई महत्वपूर्ण नाटकों का अंग बनाने का अवसर मिला जैसे- 'आओ साथी सपने देखें', 'हमार बाबूजी की छतरी' और' अक्सर मैने सोचा है.'

किंतु फिल्मों में दीपक की पहचान फिल्म 'ओंकारा' में सैफ अली को खलनायक बनाने वाले रज्जो तिवारी के रूप में पहली बार हुई. इस पात्र को पर्दे पर खूबसूरती से निभाने के लिए फ़िल्मफ़ेयर का विशेष अभिनय प्रदर्शन अवार्ड मिला.


हाँलाकि दीपक की सबसे पहली फिल्म विशाल भारद्वाज की 'मक़बूल' है,जिसमें उन्होंने कोई संवाद बोला ही नहीं था. किस्सा यूँ है कि जब दीपक विशाल जी के पास काम माँगने पहुँचे तब तक सभी पात्रों का चुनाव किया जा चुका था. सिर्फ़ एक पात्र ऐसा था जिसके लिए चुना अभिनेता सेट पर नहीं पहुँचा था. यही पार्ट विशाल भारद्वाज ने दीपक को दिया. सात वर्षों के रंगमंच के अनुभव के बावज़ूद दीपक ने इस संवाद विहीन चरित्र को निभाने का फ़ैसला किया. विशाल जी जैसे काबिल निर्देशक के साथ काम करना उन्होंने अपना एक सकारात्मक कदम माना. जब मक़बूल फिल्म रिलीज़ हुई तो दीपक ने अपने पिता को फ़ोन कर इस नई सफलता की सूचना अपने पिता को दी .उनके पिता अपने दफ़्तर के सभी सहकर्मियों सहित फिल्म देखने पहुँचे. कहना न होगा कि अपने अनुभवी पुत्र का संवाद विहीन अभिनय उन्हें अपने सहकर्मियों के सम्मुख शर्मिंदा के रसातल में डुबो गया. उनके मित्रों ने उनका ढाढ़स भी यह कहते हुए बँधाया कि 'फिल्म में दिखना भी बड़ी बात है'. क्षुब्ध पिता ने फ़ोन पर अपने पुत्र को ज़ोरदार डॉंट लगाई. कहा -'ऐसे बात कर रहा था जैसे की खुद ही मक़बूल हो'.दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है. इसीलिए जब 'ओंकारा' रिलीज़ हुई तो दीपक के पिता अकेले ही फिल्म देखने गए. जब दीपक के रोल 'तिवारी' की चर्चा आम होने लगी तब वे पूरे दफ़्तर के लोगों को फिल्म दिखाने ले गये.


दीपक के अभिनय कौशल को ' स्टूडियो 18 'की युद्ध पर बनी फिल्म '1971' के लिए भी सराहा गया. उन्होंने अनुराग कश्यप की चर्चित फिल्म 'गुलाल' ,राकेश ओमप्रकाश मेहरा की 'दिल्ली 6' ओए विशाल भारद्वाज की 'द ब्लू अम्ब्रेला' में भी काम किया है. उनकी कुछ आने वाली फिल्मों हैं- कुंदन शाह की 'मुंबई कटिंग' और बेला नेगी की 'दाँये या बाएँ'. बस मज़ा लेते रहिए दीपक के अभिनय के जौहर का.



अब आप 'ओंकारा' के इस मशहूर गीत में सैफ के साथ थिरकते एवम् सिगरेट फूँकते दीपक को पहचानें.




More Related Videos

Tuesday, May 5, 2009

शौर्य


एक आम भारतीय होने के नाते फिल्में देखने का नशा मेरे खून में है.स्कूल में ना जाने कितने लंच-ब्रेक फिल्मों की कहानी किश्तो में सुनते-सुनाते गुज़री. हर फिल्म मेरे लिए एक नई कहानी थी. मनोरंजन के इस इकलौते साधन का आनंद अनूठा था. समय बीता और आया कलात्मक फिल्मों का दौर जैसे- रुका हुआ फ़ैसला, पार, adhaarashilaa..............आदि..आदि. इन फिल्मों के संवादों का एक-एक ज़ुमला हम बड़ी तन्मयता से सुनते थे. टी.वी. के निर्माता जे. एल. बेयर्ड. जी के प्रति हमारा सम्मान दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया.
मेरी दृष्‍टि में वर्तमान काल हिन्दी फिल्मों का स्वर्णकाल है. आज ऐसे कई निर्देशक ऐसी फिल्में बनाने में सक्षम हैं जो वे अपने आत्मिक संतोष के लिए बना रहे हैं. सबसे खुशी की बात यह है कि ऐसी फिल्मों की लंबी कतार लगी हुई है. फिल्म-प्रेमियों को सजग रहना पड़ता है.

कई फिल्में हॉल तक पहुँच नहीं पातीं. हाल में ही मैंने एक फिल्म देखी " शौर्य". यह फिल्म 2008 में बनाई गई है. इस फिल्म के निर्देशक हैं समर ख़ान. फिल्म एक वकील और एक सैनिक के शौर्य अर्थात वीरता की कहानी है जो सत्य के कुरूप चेहरे को देख अपनी आँखें नहीं बंद कर लीं बल्कि अपने कर्तव्य से विमुख नहीं हुए. समाज के प्रति अपना दायित्व निभाया.
फिल्म की कहानी का रेखाचित्र कुछ ऐसा है- श्रीनगर में नियुक्त कप्‍तान ज़ावेद ख़ान (दीपक डोब्रियाल) पर अपने सहयोगी की हत्या करने का इल्ज़ाम लगाया है . मेजर सिद्धांत (राहुल बोस) अपने प्रिय मित्र मेजर आकाश (ज़ावेद ज़ाफ़री) के कहने पर बड़ी अनिच्छा से ज़ावेद ख़ान के सरकारी वकील बनने को तैयार हो जाते हैं. मेजर सिद्धांत एक पत्रकार काव्या शास्त्री (मिनिशा लांबा ) से मिलने के बाद केस में दिलचस्पी लेते हैं. केस के अभियुक्‍त ज़ावेद ख़ान कुछ भी कहने को तैयार नहीं होते. सिद्धांत तफ्तीश के दौरान कई पदकों के विजेता ब्रिगेडियर रुद्र प्रताप सिंह (के. के. मेनन ) से मिलते हैं. रुद्र प्रताप की दुनिया की परिभाषाएँ अलहदा और दिल को दहला देने वाली हैं. सिद्धांत की सत्य की तलाश ब्रिगेडियर को कटघरे तक पहुँचा देती है. ज़ावेद ख़ान निर्दोष सिद्ध होता है.
फिल्म के गीतकार जावेद अख़्तर और संगीतकार अदनान सामी हैं. के. के मेनन और राहुल बोस और दीपक डोब्रियाल ने अपनी-अपनी भूमिकाओं के प्रति न्याय किया है. फिल्म का कथानक भी प्रभावी है. सब कुछ ठीक था जब तक मैंने 1992 में बनी हौलिवुड फिल्म "ए फ़्यू गुड मेन" नहीं देखी थी.

शौर्य इस हौलिवुड फिल्म से प्रेरित होकर ही बनाई गई है. दिल यह देखकर थोड़ा छोटा अवश्य हो गया. फिर भी फिल्म सशक्‍त है. राहुल बोस पर फिल्म का निर्देशन हथियाने की तोहमत भी लगाई गई थी. जिसे उन्होंने पूर्णतया झूठा बताया. अंततः मेरी राय में फिल्म अच्छी है ज़रूर देखें.

प्रस्तुत है फिल्म का ट्रेलर-

Saturday, May 2, 2009

तुषार राहेजा की "एनीथिंग फॉर यू माम"

हमारे पतिदेव ने जब यह किताब खरीदी तो हमने किताब का शीर्षक देख ,इसे उनका "मिडिल एज सिंड्रोम" माना और कोई विशेष उत्साह जाहिर नही किया. लगा ज़रूर किसी वीर पुरुष ने अपने वीरोचित गुणों का बखान किया होगा. मुझे क्या? काफ़ी दिनों तक किताब को घूरने के बाद मैंने इसे पढ़ना शुरू किया. मज़ा आ गया.

इससे पहले मैंने चेतन भगत, अभिजीत भादुड़ी और बाद में दूर्योजय दत्ता और मानसी आहूजा की किताबें भी पढ़ी हैं. पर इस किताब का मज़ा ही कुछ और ही है. कहानी फिल्मी ढंग से ही चलती रहती है. घटनाएँ भी फिल्मी ढंग से घटित होती रहती हैं. अब आप कहेंगे तो फिर अच्छा क्या है?
तो सुनिए- ख़ासियत है कथाकार का अंदाज़े बयान.

तुषार ने तेजस और श्रेया की प्रेमकहानी को ताज़े और रुचिकर ढंग से प्रस्तुत किया है. मुझे सबसे ज़्यादा जिस बात ने छुआ, वह है कथानायक का नायिका, अपनी बहन एवं अन्य पात्रों के प्रति सम्मान. जीवन मूल्यों के प्रति आदर. कथा में हास्य रस का यथोचित सटीक और सुंदर समावेश किया गया है. विश्वाश कीजिए अगर आप किसी पूर्वाग्रह से न ग्रसित हों तो ,आप किताब पढ़ते-पढ़ते अचानक ही खिलखिला कर हँस पड़ेंगे.

आपने फिल्म "मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस." तो देखी ही होगी. सब कुछ फिल्मी था पर कहानी से जुड़े आदर्श और भावनाएँ हमें वाह-वाह करने को मज़बूर कर देते हैं. कुछ ऐसा ही मुझे इस कहानी को पढ़ कर लगा.
तुषार राहेजा कथाकार के रूप में सफल साबित हुए हैं. यह उनकी पहली पुस्तक है जिसे उन्होंने आई. आई. टी. दिल्ली में इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग करते हुए फाइनल ईयर में लिखा. उनको इस किताब के सफल लेखन के लिए बधाई.

सृष्टि प्रकाशन की इस किताब का मूल्य मात्र सौ रुपये है.
कुछ पाठकों ने पुस्तक की विषयवस्तु अति साधारण होने का दोष मढ़ा है. मैं उन्हें बस इतना कहूँगी की ज़िंदगी का असली मज़ा छोटी-छोटी बातों को जी-भर कर जी लेने में है. बड़े- बड़े आदर्शों को नेताओं के लिए छोड़ दीजिए.