Friday, June 12, 2009

बम भोले बाबा कहवाँ रंगइल पागड़िया....

पिछली पोस्ट में मैने भीति चित्रों का ज़िक्र किया था. उसी कड़ी में प्रस्तुत हैं कुछ चित्र जिन्हें देख मुझे शिव भक्ति में डूबा यह भोजपुरी गीत सहसा याद आ गया .


बम भोले बाबा कहवाँ रंगइल पागड़िया....





यह है' मंदिरों के इस शहर' का सबसे चर्चित लिंगराज मंदिर, जहाँ श्रद्धालुओं की भीड़ सावन के महीने में जल-अर्पण करने पहुँचती है. शिवरात्रि के दिन इस देवालय के प्रांगण में तिल रखने की भी जगह नहीं होती.







इस चित्र में' बिंदुसागर' दिख रहा है. जिसके सुंदरीकरण में मुख्यमंत्री नवीन पटनायक विशेष रूचि ले रहे हैं.






बी. एम. सी. अर्थात भुबनेस्वर म्यूनिस्पल कार्पोरेशन








सावन के महीने में शिव-भक्त अपनी-अपनी मन्नतों के चिराग दिल में लिए कांवर ले कर पदयात्रा को निकल पड़ते हैं और शिव मंदिरों में जल-अर्पण करते हैं.

इस महीने में भक्त प्याज-लहसुन ,माँस इत्यादि का सेवन बंद कर देते हैं.
खाने की बात निकली है तो मैं आपको यहाँ लगे हाथों बता दूँ कि भोजन के मामले में इस प्रदेश के निवासी बड़े सचेत हैं.यहाँ शाक- सब्जियों की खपत बहुत होती है. इसका अंदाज़ा आप इस बात से लगाने की कोशिश करें कि भोज में भी लोग साग-बड़ी (बिना मसाले की) बड़े शौक से खाते हैं. लोग अधिकांशतः माँसाहारी हैं , अपनी-अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार कुछेक दिन जैसे सोमवार एवं गुरुवार को मांसाहार नहीं करते हैं.

यहाँ कई मंदिरों में शाकाहारी भोजन की व्यवस्था होती है. आप चाहें तो उस मंदिर के प्रांगण में भोज आयोजित या अपने घर में भोजन मंगवा सकते हैं.

इस राज्य के निवासी अत्यंत धार्मिक-प्रकृति के हैं. पहले चित्र में प्रदर्शित 'लिंगराज मंदिर' ग्यारहवीं शताब्दी में सोमवंशी राजा "जजाति केशरी" ने बनवाया था. यह मंदिर दो लाख पचास हज़ार वर्ग फीट में फैला हुआ है. मुख्य मंदिर लगभग एक सौ अस्सी फीट उँचा है. इसके मुख्य अंग यज्ञशाला , नट मंदिर और भोजमंडप है. मंदिर की चहारदीवार सात फीट मोटी है.इसके गर्भ-गृह में ग्रेनाइट का बना आठ मीटर व्यास वाला शिवलिंग है.




इस मंदिर की स्थापत्य कला का एक नमूना.

मंदिर लाल सैंड स्टोन से बना हुआ है. जिसे रोज़ दूध,पानी और भांग से नहलाया जाता है. इस मंदिर की एक और विशेषता यह है कि इसमें शिव और विष्णु के सम्मिलित रूप 'हरिहर' की उपासना की जाती है. इसके भव्य प्रांगण में लगभग सौ छोटे-छोटे मंदिर हैं.








इस प्रस्तर प्रांगण की खूबसूरती निरखने में घंटे यूँही गुज़र जाएँगे आपको पता भी नहीं चलेगा.

2 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

जय बम भोले।

‘नज़र’ said...

आपको पिता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ...

---

चाँद, बादल और शाम | गुलाबी कोंपलें